छत्तीसगढ़ में समान नागरिक संहिता: नवीनतम स्थिति व पृष्ठभूमि
परिचय
समान नागरिक संहिता (UCC) का उद्देश्य धर्म की परवाह किए बिना नागरिकों के लिए नागरिक कानूनों का एक समान समूह स्थापित करना है, विशेष रूप से विवाह, तलाक, विरासत, गोद लेना और भरण-पोषण जैसे मामलों में।
छत्तीसगढ़ में समान नागरिक संहिता के मुद्दे ने नए सिरे से महत्व हासिल किया है क्योंकि राज्य सरकार ने छत्तीसगढ़ में UCC लागू करने के लिए एक रूपरेखा तैयार करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। सेवानिवृत्त सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता में एक उच्च-स्तरीय समिति का गठन किया गया है, जो मौजूदा व्यक्तिगत कानूनों की जांच करेगी और सिफारिशें देगी।
राज्य स्तरीय परिचयात्मक बैठक 27 अगस्त 2026 को न्यू सर्किट हाउस, सिविल लाइंस, रायपुर में निर्धारित है, जिसमें लगभग 200 नागरिकों, जनप्रतिनिधियों और विशेषज्ञों के भाग लेने की उम्मीद है। सरकार ने नागरिकों और संगठनों से 30 सितंबर 2026 तक सुझाव भी आमंत्रित किए हैं।
खबरों में क्यों?
छत्तीसगढ़ सरकार राज्य में समान नागरिक संहिता लागू करने की तैयारियों में तेजी ला रही है।
प्रमुख घटनाक्रम
- राज्य स्तरीय परिचयात्मक बैठक 27 अगस्त 2026 को आयोजित की जाएगी।
- स्थान: न्यू सर्किट हाउस, सिविल लाइंस, रायपुर
- लगभग 200 नागरिकों, प्रतिनिधियों और विशेषज्ञों को आमंत्रित किया गया है।
- जनता से 30 सितंबर 2026 तक सुझाव आमंत्रित किए जा रहे हैं।
- राज्य सरकार छत्तीसगढ़ विधानसभा के आगामी शीतकालीन सत्र के दौरान UCC विधेयक पेश करने की योजना बना रही है।
- सेवानिवृत्त सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता में एक उच्च-स्तरीय समिति पहले ही गठित की जा चुकी है।
- समिति व्यक्तिगत नागरिक मामलों से संबंधित मौजूदा कानूनों और प्रथाओं की जांच करेगी।
CGPSC फोकस: UCC से संबंधित सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रावधान अनुच्छेद 44 है, जो राज्य के नीति-निदेशक तत्वों का हिस्सा है।
समान नागरिक संहिता क्या है?
समान नागरिक संहिता नागरिकों की धार्मिक पहचान की परवाह किए बिना उन पर लागू होने वाले नागरिक कानूनों के एक समान ढांचे को संदर्भित करती है।
इसका उद्देश्य निम्नलिखित क्षेत्रों में अधिक एकरूपता लाना है:
- विवाह
- तलाक
- विरासत
- गोद लेना
- भरण-पोषण
- अन्य व्यक्तिगत नागरिक मामले
वर्तमान में भारत धर्म-आधारित व्यक्तिगत कानूनों और धर्मनिरपेक्ष नागरिक कानूनों के संयोजन का पालन करता है।
भारत के राज्यों में समान नागरिक संहिता (UCC) — कालानुक्रमिक क्रम
| क्रम | राज्य | UCC से संबंधित घटनाक्रम | तिथि / वर्ष | स्थिति |
|---|---|---|---|---|
| 1 | उत्तराखंड | UCC विधेयक विधानसभा द्वारा पारित | 7 फरवरी 2024 | 27 जनवरी 2025 से लागू |
| 2 | गुजरात | गुजरात समान नागरिक संहिता विधेयक, 2026 पारित | 24 मार्च 2026 | विधेयक पारित |
| 3 | असम | समान नागरिक संहिता, असम विधेयक, 2026 पारित | 27 मई 2026 | विधेयक पारित |
त्वरित परीक्षा तथ्य — राज्यों में UCC
- उत्तराखंड → गुजरात → असम
1st → 2nd → 3rd राज्य जिन्होंने UCC से संबंधित कानून/विधेयक पारित किया। - उत्तराखंड स्वतंत्र भारत का पहला राज्य है जिसने राज्य कानून के माध्यम से व्यापक समान नागरिक संहिता (UCC) को लागू किया।
- असम UCC से संबंधित कानून पारित करने वाला पूर्वोत्तर भारत का पहला राज्य है।
UCC का संवैधानिक आधार
अनुच्छेद 44
- संविधान का अनुच्छेद 44 कहता है कि राज्य भारत के पूरे क्षेत्र में नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने का प्रयास करेगा।
- यह राज्य के नीति-निदेशक तत्व (DPSP) में शामिल है।
महत्वपूर्ण बिंदु
- अनुच्छेद 44 अदालतों द्वारा सीधे लागू नहीं किया जा सकता। हालांकि, यह राज्य को एक संवैधानिक नीतिगत दिशा प्रदान करता है।
प्रीलिम्स तथ्य:
अनुच्छेद 44 → समान नागरिक संहिता → राज्य के नीति-निदेशक तत्व
पृष्ठभूमि और ऐतिहासिक संदर्भ
समान नागरिक कानूनों पर बहस संविधान से पहले की है।
औपनिवेशिक काल के दौरान विभिन्न समुदाय परिवार से जुड़े मामलों में अलग-अलग व्यक्तिगत कानूनों का पालन करते रहे। इसके बाद कानूनी एकरूपता का प्रश्न भारत की संवैधानिक बहस का हिस्सा बन गया।
संविधान निर्माण के दौरान UCC के प्रश्न पर निम्नलिखित विषयों के बीच काफी चर्चा हुई:
- समानता
- धर्मनिरपेक्षता
- व्यक्तिगत अधिकार
- धार्मिक स्वतंत्रता
- सांस्कृतिक विविधता
समझौते के रूप में UCC को अनुच्छेद 44 के तहत रखा गया, बजाय इसके कि इसे तुरंत लागू होने वाला मौलिक अधिकार बनाया जाए।
स्वतंत्रता के बाद का विकास
हिंदू कोड विधेयक 1955–56 ने हिंदू व्यक्तिगत कानून के प्रमुख पहलुओं को वैधानिक रूप दिया।
इसके बाद UCC की बहस ने व्यक्तिगत कानूनों से जुड़े महत्वपूर्ण न्यायिक मामलों के माध्यम से फिर से महत्व प्राप्त किया, जिनमें शामिल हैं:
- भरण-पोषण
- विवाह
- धर्म परिवर्तन
- विरासत
- लैंगिक समानता
- व्यक्तिगत कानून
भारत में वर्तमान नागरिक-कानून ढांचा
वर्तमान में भारत में सभी नागरिकों को नियंत्रित करने वाला एक समान व्यक्तिगत कानून नहीं है।
विभिन्न समुदाय अलग-अलग व्यक्तिगत-कानून ढांचे द्वारा शासित होते हैं, जबकि कुछ धर्मनिरपेक्ष कानून धर्म की परवाह किए बिना लागू होते हैं।
हिंदू व्यक्तिगत कानून
प्रमुख कानूनों में शामिल हैं:
- हिंदू विवाह अधिनियम, 1955
- हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956
- हिंदू अल्पसंख्यक और संरक्षकता अधिनियम, 1956
- हिंदू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम, 1956
इन कानूनों के लिए “हिंदू” शब्द में वैधानिक ढांचे के तहत सिख, जैन और बौद्ध भी शामिल हैं।
मुस्लिम व्यक्तिगत कानून
मुस्लिम व्यक्तिगत कानून काफी हद तक धार्मिक सिद्धांतों पर आधारित है और इसे निम्नलिखित कानूनों के माध्यम से भी मान्यता दी गई है:
- मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लीकेशन एक्ट, 1937
- मुस्लिम विवाह-विच्छेद अधिनियम, 1939
ईसाई व्यक्तिगत कानून
ईसाई विवाह इंडियन क्रिश्चियन मैरिज एक्ट, 1872 के तहत शासित होते हैं, साथ ही वैवाहिक मामलों को नियंत्रित करने वाले अन्य लागू कानून भी हैं।
धर्मनिरपेक्ष नागरिक कानून
कुछ कानून धर्म की परवाह किए बिना लागू होते हैं।
एक महत्वपूर्ण उदाहरण है:
- विशेष विवाह अधिनियम, 1954
- यह नागरिक विवाहों के लिए कानूनी ढांचा प्रदान करता है, जिसमें अंतर-धार्मिक विवाह भी शामिल हैं।
प्रीलिम्स तथ्य: विशेष विवाह अधिनियम धर्म-निरपेक्ष नागरिक कानून का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है।
UCC और विशेष संवैधानिक प्रावधान
समान नागरिक कानूनों का कार्यान्वयन भारत के संघीय और सांस्कृतिक विविधता से भी जुड़ा है।
कुछ संवैधानिक प्रावधान विशेष क्षेत्रों और समुदायों को विशेष संरक्षण प्रदान करते हैं।
दिए गए स्रोत में अनुच्छेद 371 और असम, नागालैंड और मिजोरम जैसे राज्यों से संबंधित विशेष प्रावधानों का उल्लेख अलग क्षेत्रीय पहचान की सुरक्षा के संदर्भ में किया गया है।
UCC पर महत्वपूर्ण सुप्रीम कोर्ट के फैसले
सुप्रीम कोर्ट ने कई महत्वपूर्ण मामलों में व्यक्तिगत कानूनों, लैंगिक समानता और अधिक कानूनी एकरूपता की आवश्यकता से जुड़े प्रश्नों पर विचार किया है।
1. शाह बानो मामला, 1985
- शाह बानो मामला एक तलाकशुदा मुस्लिम महिला के भरण-पोषण के अधिकार से संबंधित था।
- सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने लैंगिक न्याय और व्यक्तिगत कानूनों के प्रश्न को राष्ट्रीय बहस में ला दिया और अनुच्छेद 44 पर चर्चा को फिर से तेज किया।
शाह बानो → भरण-पोषण → व्यक्तिगत कानून → UCC बहस
2. सरला मुद्गल बनाम भारत संघ, 1995
- इस मामले में धर्म परिवर्तन, विवाह और बहुविवाह से संबंधित प्रश्न शामिल थे।
- इस फैसले ने व्यक्तिगत कानूनों में अधिक एकरूपता की आवश्यकता पर बहस में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
3. जॉन वल्लामट्टोम बनाम भारत संघ, 2003
- सुप्रीम कोर्ट ने व्यक्तिगत कानून के प्रावधानों के भेदभावपूर्ण पहलुओं की जांच की और समानता और कानूनी एकरूपता से जुड़े प्रश्नों पर प्रकाश डाला।
4. शायरा बानो मामला, 2017
सुप्रीम कोर्ट ने तत्काल तीन तलाक (तलाक-ए-बिद्दत) की प्रथा को असंवैधानिक घोषित किया।
यह फैसला निम्नलिखित विषयों की चर्चा में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम बना:
- लैंगिक समानता
- व्यक्तिगत कानून
- संवैधानिक अधिकार
- भेदभावपूर्ण प्रथाओं में सुधार
प्रीलिम्स तथ्य:
शायरा बानो मामला, 2017 → तत्काल तीन तलाक
छत्तीसगढ़ में समान नागरिक संहिता
छत्तीसगढ़ सरकार की वर्तमान पहल राज्य की परिस्थितियों के अनुरूप एक ढांचा विकसित करने पर केंद्रित है।
न्यायमूर्ति रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता वाली समिति व्यक्तिगत नागरिक मामलों से संबंधित मौजूदा कानूनी व्यवस्थाओं की समीक्षा करेगी और सिफारिशें देगी।
परामर्श प्रक्रिया महत्वपूर्ण है क्योंकि सरकार ने निम्नलिखित से सुझाव लेने का निर्णय लिया है:
- नागरिक
- विशेषज्ञ
- जनप्रतिनिधि
- विभिन्न सामाजिक समूह
- अन्य हितधारक
तीन महत्वपूर्ण तिथियां/घटनाक्रम
| घटनाक्रम | विवरण |
|---|---|
| समिति | न्यायमूर्ति रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता में |
| राज्य स्तरीय बैठक | 27 अगस्त 2026 |
| जनता के सुझाव | 30 सितंबर 2026 तक |
| प्रस्तावित कानून | राज्य विधानसभा का शीतकालीन सत्र |
छत्तीसगढ़ फोकस: परामर्श प्रक्रिया नीति और कानून निर्माण में हितधारकों की भागीदारी का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है।
UCC का महत्व
- लैंगिक न्याय
- UCC के पक्ष में प्रमुख तर्कों में से एक यह है कि समान नागरिक नियम निम्नलिखित मामलों में अधिक समानता सुनिश्चित करने में मदद कर सकते हैं:
- विवाह
- तलाक
- भरण-पोषण
- विरासत
- UCC के पक्ष में प्रमुख तर्कों में से एक यह है कि समान नागरिक नियम निम्नलिखित मामलों में अधिक समानता सुनिश्चित करने में मदद कर सकते हैं:
- कानून के समक्ष समानता
- एक समान ढांचा इस सिद्धांत को मजबूत कर सकता है कि समान परिस्थितियों वाले नागरिकों को नागरिक मामलों में समान कानूनी व्यवहार मिलना चाहिए।
- कानूनी सरलीकरण
- कई व्यक्तिगत-कानून प्रणालियां जटिलता पैदा कर सकती हैं। एक समान ढांचा कुछ नागरिक-कानून प्रक्रियाओं को समझने में संभावित रूप से आसान बना सकता है।
- राष्ट्रीय एकीकरण
- समर्थकों का तर्क है कि समान नागरिक नियम साझा नागरिक पहचान को मजबूत कर सकते हैं।
- संवैधानिक लक्ष्य
- UCC का अनुच्छेद 44 के तहत स्पष्ट संवैधानिक संदर्भ है, जो इसे संवैधानिक शासन के लिए एक महत्वपूर्ण मुद्दा बनाता है।
प्रमुख चिंताएं और चुनौतियां
UCC एक अत्यंत संवेदनशील और बहस का विषय भी है।
- धार्मिक स्वतंत्रता
- भारत का संविधान धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा करता है। इसलिए व्यक्तिगत कानूनों में किसी भी सुधार को धार्मिक स्वतंत्रता के साथ सावधानीपूर्वक संतुलित करना होगा।
- सांस्कृतिक विविधता
- भारत में अलग-अलग परंपराओं और प्रथाओं वाले विविध समुदाय हैं।
- आदिवासी और क्षेत्रीय प्रथाएं
- किसी भी समान ढांचे में प्रथागत परंपराओं की सावधानीपूर्वक जांच आवश्यक होगी, विशेष रूप से उन क्षेत्रों में जहां संवैधानिक प्रावधान विशिष्ट सामाजिक और सांस्कृतिक प्रथाओं की रक्षा करते हैं।
- एकरूपता बनाम समानता
- एकरूपता अपने आप में वास्तविक समानता की गारंटी नहीं देती।
- एक अच्छी तरह से तैयार किए गए UCC in CG को यह सुनिश्चित करना होगा कि कानून निष्पक्ष और गैर-भेदभावपूर्ण हो, न कि केवल हर परिस्थिति में समान हो।
- कार्यान्वयन
- कानून बनने के बाद भी प्रभावी कार्यान्वयन के लिए आवश्यक होगा:
- प्रशासनिक तैयारी
- जन जागरूकता
- कानूनी स्पष्टता
- अधिकारियों का प्रशिक्षण
- उचित संस्थागत तंत्र
- कानून बनने के बाद भी प्रभावी कार्यान्वयन के लिए आवश्यक होगा:
छत्तीसगढ़ में सरकार का दृष्टिकोण
वर्तमान छत्तीसगढ़ प्रक्रिया में परामर्श और मसौदा तैयार करने पर काफी जोर दिया गया है।
प्रस्तावित दृष्टिकोण में शामिल हैं:
- विशेषज्ञ समिति की समीक्षा
- हितधारकों के साथ परामर्श
- जनता से सुझाव
- मौजूदा व्यक्तिगत कानूनों की जांच
- मसौदा ढांचे की तैयारी
- विधायी विचार-विमर्श
यह दर्शाता है कि सरकार विधानसभा के समक्ष कानून लाने से पहले इस मुद्दे की जांच करने का प्रयास कर रही है।
भारत का परिप्रेक्ष्य
राष्ट्रीय स्तर पर UCC कई संवैधानिक सिद्धांतों के संगम पर स्थित है।
महत्वपूर्ण संवैधानिक आयाम
अनुच्छेद 14: कानून के समक्ष समानता
अनुच्छेद 15: भेदभाव का निषेध
अनुच्छेद 21: जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का संरक्षण
अनुच्छेद 25: अंतःकरण और धर्म की स्वतंत्रता
अनुच्छेद 26: धार्मिक मामलों के प्रबंधन की स्वतंत्रता
अनुच्छेद 44: समान नागरिक संहिता
राज्य और UCC
दिए गए स्रोत में कहा गया है कि गोवा और उत्तराखंड में UCC के ढांचे लागू हैं, जबकि कई अन्य राज्यों ने इस मुद्दे पर विचार करने या कानून बनाने की दिशा में कदम उठाए हैं।
स्रोत सामग्री में गुजरात, असम और मध्य प्रदेश को भी UCC कानून की दिशा में कदम उठाने वाले राज्यों के रूप में बताया गया है।
प्रीलिम्स दृष्टिकोण
- UCC का संवैधानिक प्रावधान: अनुच्छेद 44
- संविधान का भाग: राज्य के नीति-निदेशक तत्व
- अनुच्छेद 44: सीधे लागू करने योग्य नहीं
- शाह बानो: 1985
- सरला मुद्गल: 1995
- जॉन वल्लामट्टोम: 2003
- शायरा बानो: 2017
- शायरा बानो मामला: तत्काल तीन तलाक
- विशेष विवाह अधिनियम: 1954
- हिंदू विवाह अधिनियम: 1955
- हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम: 1956
- मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लीकेशन एक्ट: 1937
- उल्लिखित ईसाई विवाह कानून: इंडियन क्रिश्चियन मैरिज एक्ट, 1872
- छत्तीसगढ़ UCC समिति की अध्यक्ष: न्यायमूर्ति रंजना प्रकाश देसाई
- छत्तीसगढ़ परामर्श बैठक: 27 अगस्त 2026
- जनता से सुझाव की अंतिम तिथि: 30 सितंबर 2026
निष्कर्ष
समान नागरिक संहिता पर बहस भारत के सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्नों में से एक को दर्शाती है: समानता और समान नागरिक अधिकारों को धार्मिक स्वतंत्रता और सांस्कृतिक विविधता के साथ कैसे संतुलित किया जाए।
UCC in CG के लिए चल रही समिति प्रक्रिया, हितधारकों से परामर्श और UCC विधेयक पेश करने का प्रस्ताव राज्य स्तर की कानूनी और शासन नीति में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम है। ऐसे किसी भी ढांचे की सफलता केवल विधायी कार्रवाई पर ही नहीं, बल्कि सावधानीपूर्वक परामर्श, संवैधानिक सुरक्षा उपायों, कानूनी स्पष्टता और प्रभावी कार्यान्वयन पर भी निर्भर करेगी।
CGPSC प्रीलिम्स अभ्यास प्रश्न
प्रश्न 1
समान नागरिक संहिता के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
- संविधान का अनुच्छेद 44 समान नागरिक संहिता से संबंधित है।
- अनुच्छेद 44 राज्य के नीति-निदेशक तत्वों का हिस्सा है।
- अनुच्छेद 44 अदालतों द्वारा सीधे लागू किया जा सकता है।
उपरोक्त में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
A. केवल 1 और 2
B. केवल 2 और 3
C. केवल 1 और 3
D. 1, 2 और 3
उत्तर: A
व्याख्या: अनुच्छेद 44 राज्य को समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने का प्रयास करने का निर्देश देता है। यह DPSP का हिस्सा है और अदालतों द्वारा सीधे लागू नहीं किया जा सकता।
प्रश्न 2
निम्नलिखित में से कौन-सा युग्म सही सुमेलित है?
A. शाह बानो — 1985 — भरण-पोषण
B. सरला मुद्गल — 2017 — तीन तलाक
C. शायरा बानो — 1995 — धर्म परिवर्तन और बहुविवाह
D. जॉन वल्लामट्टोम — 1955 — हिंदू विवाह
उत्तर: A
व्याख्या: 1985 का शाह बानो मामला एक तलाकशुदा मुस्लिम महिला के भरण-पोषण से संबंधित था और राष्ट्रीय UCC बहस का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बना। शायरा बानो (2017) तत्काल तीन तलाक से जुड़ा है, जबकि सरला मुद्गल (1995) में धर्म परिवर्तन और विवाह जैसे मुद्दे शामिल थे।
CGPSC मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न
- “समान नागरिक संहिता समानता और भारत के बहुलवादी चरित्र के बीच एक संवैधानिक संतुलन से जुड़ी है।” चर्चा करें।
- प्रस्तावित समान नागरिक संहिता के लिए छत्तीसगढ़ की चल रही परामर्श प्रक्रिया के महत्व की जांच करें।
एक-मिनट रिवीजन
- विषय: UCC in CG
- संवैधानिक प्रावधान: अनुच्छेद 44
- संवैधानिक भाग: DPSP
- प्रकृति: सीधे लागू करने योग्य नहीं
- छत्तीसगढ़ समिति: न्यायमूर्ति रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता में
- राज्य स्तरीय बैठक: 27 अगस्त 2026
- स्थान: न्यू सर्किट हाउस, सिविल लाइंस, रायपुर
- जनता से सुझाव: 30 सितंबर 2026 तक
- प्रस्तावित विधेयक: छत्तीसगढ़ विधानसभा का शीतकालीन सत्र
- शाह बानो: 1985
- सरला मुद्गल: 1995
- जॉन वल्लामट्टोम: 2003
- शायरा बानो: 2017
- शायरा बानो: तत्काल तीन तलाक
- विशेष विवाह अधिनियम: 1954
- मुख्य बहस: समानता बनाम धार्मिक/सांस्कृतिक विविधता
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